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नागरिक अधिकारों का संरक्षण अधिनियम, 1955

इस लेख में नागरिक अधिकारों का संरक्षण अधिनियम 1955 को संक्षिप्त में विश्लेषित किया गया है।

इस लेख में नागरिक अधिकारों का संरक्षण अधिनियम, 1955 को संक्षिप्त में विश्लेषित किया गया है।

नागरिक अधिकारों का संरक्षण अधिनियम, 1955

नागरिक अधिकारों का संरक्षण अधिनियम 1955 दिनांक 8 मई, 1995 को अस्तित्व में आया था। इस अधिनियम के माध्यम से प्रत्येक व्यक्ति को निम्नलिखित अधिकार प्राप्त हैं:
धारा: 3 धार्मिक अधिकार
1. वह किसी लोक पूजा स्थल पर प्रवेश कर सकता है. जो उसके धर्म के लोगों के लिए खोला गया है।
2. किसी पूजा स्थल में पूजा/प्रार्थना कर सकता है।
3. किसी पवित्र सरोवर (तालाब), नदी, कुएं चश्मे आदि में सेवा कर सकता है तथा स्नान कर सकता है।
नोट: उपरोक्त कार्य के लिए कोई भी व्यक्ति छुआछूत करेगा तो वह नियम के अनुसार कम-से-कम एक माह या अधिक-से-अधिक 6 माह के कारावास तथा कम-से-कम ₹ 100 और अधिक-से-अधिक ₹ 500 जुर्माना तक दंडित किया जा सकेगा।

धारा :4 सामाजिक अधिकार
1. कोई भी व्यक्ति किसी दुकान, पब्लिक रेस्टोरेन्ट, होटल या लोक मनोरंजन स्थान में प्रवेश कर सकता है ।
2. वह किसी आम रेस्तरां (रेस्टोरेन्ट). होटल, धर्मशाला, सराय या मुसाफिर खाना में रखे बर्तनों या अन्य वस्तुओं का, जो जन-साधारण या उसी धर्म के लोगों के प्रयोग में लाये जाते है, प्रयोग कर सकता है।
3. वह किसी व्यवसाय या व्यापार या कारोबार या किसी भी कार्य में रोजगार कर सकता है।
4. वह किसी नदी, जल धारा, जल स्रोत. चश्मे, कुए. तालाब, हौज, पानी के नल या पानी के स्थान घाट, कब्रिस्तान या श्मशान भूमि या शौचालय सुविधा, सड़क, रास्ते या किसी अन्य सार्वजनिक स्थान, जो आम जनता के सदस्यों या उसके किसी भाग , जिसका वह सदस्य है, का प्रयोग करने या उस पर अधिकार रखते हैं, पर जा सकता है।
5. वह ऐसे स्थान जिसका प्रयोग धर्मार्थ (चैरिटेबल) या सार्वजनिक स्थल के रूप में किया जाता है और जो पूरी तौर पर या आंशिक रूप से राज्य निधि द्वारा संचालित है या जन-साधारण या उसके किसी भाग के प्रयोग के लिए समर्पित हो, का प्रयोग कर सकता है।
6. वह किसी धर्मार्थ ट्रस्ट के अधीन किसी लाभ की प्राप्ति करने के लिए आम जनता या उसके किसी भाग, जिसका वह सदस्य हो, के लाभ का उपयोग कर सकता है।
7. वह किसी भी सार्वजनिक सवारी का उपयोग या उसमें प्रवेश कर सकता है।
8. वह किसी भी बस्ती में घर बना सकता है तथा रह सकता है।
9. वह किसी धर्मशाला, सराय या मुसाफिर खाना, जो जन-साधारण के लिए या उसके किसी भाग के लिए खुला हो, का प्रयोग कर सकता है।
10. वह किसी सामाजिक या धार्मिक रीति रिवाज या प्रजा का कार्य, किसी धार्मिक, सामाजिक या सांस्कृतिक जुलूस में भाग ले सकता है या जुलूस निकाल सकता है। वह वस्त्र या जेवरात का प्रयोग कर सकता है।

नोटः यदि कोई व्यक्ति छुआछूत के आधार पर यह कार्य करने से रोकेगा अथवा बाधा पहुंचाएगा तो वह कम-से-कम एक माह तथा अधिकतम 6 माह के कारावास सहित कम-से-कम ₹ 100 रुपये तथा अधिक-से-अधिक ₹ 500 के दण्ड से दण्डनीय होगा।
धारा: 5 अस्पताल आदि में अधिकार
वह किसी अस्पताल, दवाखाना, शिक्षण संस्था या किसी होस्टल (छात्रावास), जो आम लोगों या उसके किसी भाग के लिए बनाए या स्थापित किए गए हैं, उनमें प्रवेश ले सकता है।

नोट: इन संस्थाओं में से किसी संस्था में प्रवेश देने के बाद भेदभाव करने वाला व्यक्ति कम-से-कम एक माह और अधिक-से-अधिक 6 माह की सजा तथा कम-से-कम ₹ 100 तथा अधिक से अधिक ₹ 500 के जुर्माने से दण्डनीय होगा।
धारा: 6 वस्तुएँ बेचने और सेवाएं प्रदान करने का अधिकार
कोई व्यक्ति जो छुआछूत (अस्पृश्यता) के आधार पर किसी व्यक्ति को वस्तुएं बेचने या सेवाएं देने से इंकार करें, जो उसी समय उसी स्थान पर उन्हीं सही शर्तों के आधार पर कारोबार के सामान्य अनुक्रम में अन्य लोगों को बेची जाती है या सेवाएं प्रदान की जाती है, तो ऐसे व्यक्ति कारावास के दण्ड की ऐसी अवधि कम-से-कम एक माह या अधिक से अधिक 6 माह तक हो सकेगी और साथ में जुर्माने से जो कम से कम ₹100 तथा अधिक से अधिकर 500 तक हो सकेगा, से दण्डनीय होंगे।
धारा: 7 छुआछूत/ अस्पृश्यता पर आधारित अन्य अपराधों के लिए दण्ड: कोई व्यक्ति जो:

1. किसी व्यक्ति को संविधान के अनुच्छेद, 17 के अनुसार छुआछूत का उन्मूलन होने पर, उसे प्राप्त किसी अधिकार का प्रयोग करने से रोके।
2. किसी व्यकित को किसी ऐसे अधिकार का प्रयोग करने से रोके, क्षति पहुंचाए, क्रोधित करें (गुस्सा दिलाये), रूकावट डाले या रुकावट डालने का प्रयत्न करें या ऐसे अधिकार का प्रयोग करने पर पीड़ा पहुंचाए या बॉयकाट (बहिष्कार) करे।
3. किसी व्यक्ति को या किसी वर्ग के व्यक्तियों को या साधारण जनता को शब्दों से बोलकर या लिखकर इशारों से या दिखाकर या किसी अन्य प्रकार से छुआछूत प्रयोग करने के लिए उकसाए या लोगों को ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करें।
4. छुआछूत के आधार पर अनुसूचित जाति के किसी सदस्य का अपमान करने का प्रयत्न करे तो ऐसा व्यक्ति, कारावास के दण्ड की ऐसी अवधि जो कम से कम एक माह और अधिक से अधिक 6 माह तक तथा कम-से-कम एक सौ रुपया और अधिक-से-अधिक 500 तक जुर्माना से दण्डनीय होगा।
5. किसी व्यक्ति के विषय में समझा जाएगा कि वह बॉयकाट (बहिष्कार) करता है. यदि वह:
(क) किसी ऐसे अन्य व्यक्ति को, कोई गृह या भूमि किराये पर देने से या उसका प्रयोग करने देने से या अधिकार में रखने की आज्ञा देने से इंकार करें या उसके साथ लेन-देन करने से इंकार करें, उसके साथ कोई कारोबार करने या कोई सेवा लेने या देने से इंकार करें या इन बातों में से किसी को ऐसी शर्तों पर करने से इंकार कर जिनके आधार पर ऐसी बातें कारोबार के साधारण अनुक्रम में आमतौर से की जाती है या
(ख) ऐसे सामाजिक, व्यवसायिक या व्यापारिक संबंधों से अपने आपको अलग कर लेता है, जो वह ऐसे अन्य व्यक्ति के साथ आमतौर से बनाये रखता है।
(ग) खण्ड ‘ग’ के प्रयोजनों के लिए किसी व्यक्ति के बारे में समझा जाएगा कि वह छुआछूत को बढ़ावा देता है या प्रोत्साहित करता है, यदि वहः
1. प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष छुआछूत (अस्पृश्यता) का प्रचार करता है या किसी भी रूप में इसको व्यवहार में लाने का उपदेश देता है।
2. किसी भी रूप में हुआछूत के आचरण को ऐतिहासिक, दार्शनिक, धार्मिक या जाति व्यवस्था की किसी प्रथा के आधार पर या किसी अन्य आधार पर न्यायोचित ठहरायेगा।

धाराः 7-1/ए
अनुच्छेद. 17 के अधीन अधिकारः जो कोई व्यक्ति संविधान के अनुच्छेद 17 के अधीन छुआछूत उन्मूलन के कारण किसी अन्य व्यक्ति को प्राप्त किसी ऐसे अधिकार का प्रयोग किए जाने पर विरोध के रूप में या बदला लेने की भावना से उसके शरीर या सम्पत्ति के विरुद्ध कोई अपराध करता है, तो वह अपराध जहां 2 वर्ष की अवधि के कारावास से दण्डनीय है, वहां कम-कम 2 वर्ष की अवधि के कारावास और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

धारा:7-2
सामुदायिक अधिकार- जो कोई व्यक्ति,
1. अपने समुदाय या उसके भाग से संबंधित या अन्य व्यक्ति को किसी ऐसे अधिकार या विशेषाधिकार से वंचित रखेगा. जिसके लिए वह व्यक्ति उस समुदाय या उसके भाग का सदस्य होने के नाते अधिकार रखता है।
2. ऐसे व्यक्ति को जाति से निष्कासित करने में कोई भाग ले या उस व्यक्ति ने अस्पृश्यता को मानने से इंकार कर दिया हो, जिससे इस एक्ट का मन्तव्य पूरा होने में बाधा उत्पन्न हुई हो, तो ऐसा व्यक्ति कारावास की ऐसी अवधि से, जो कम-से-कम एक माह और अधिक-से-अधिक 6 माह और कम-से-कम ₹100 और अधिक-से-अधिक ₹500 तक के जुर्माने से दण्डनीय होगा।

धारा 7-क
अवैध अनिवार्य श्रम को कब छुआछूत समझा जायेगा
1. जब कोई व्यक्ति जो किसी अन्य व्यक्ति को अस्पृश्यता (छुआछूत) के आधार पर सफाई करने, झाडू लगाने, मरे हुए पशु को हटाने, पशु की खाल उतारने, नाल काटने या इसी प्रकार का कोई अन्य काम करने के लिए मजबूर करेगा तो उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने अस्पृश्यता के कारण पैदा होने वाली अयोग्यता को लागू किया है।
2. जिस व्यक्ति के बारे में उपधारा (क) के अधीन यह धारणा की जाती है कि उसने अस्पृश्यता द्वारा पैदा ऐसी अयोग्यता को लागू किया है, जिसके फलस्वरूप नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 का मन्तव्य पूरा होने में बाधा हुई तो वह व्यक्ति कम-से-कम 3 माह और अधिक-से-अधिक 6 माह तक की अवधि के कारावास और ऐसे जुर्माने से भी जो कम-से-कम ₹ 100 और अधिक-से-अधिक ₹ 500 तक हो सकता है, से दण्डनीय होगा।
3. इस धारा के प्रयोजनों के लिए मजबूर करने के अंतर्गत सामाजिक या आर्थिक बायकाट (बहिष्कार) करने की धमकी भी शामिल है।

धारा: 10
अपराध का दुष्प्रेरण
1. कोई व्यक्ति जो एक एक्ट के अधीन किसी अपराध का दुष्प्रेरण करेगा, वह उसी अपराध के दण्ड से दण्डित किया जायेगा, जो उस अपराध के लिए निर्धारित है।

धारा: 13/15
सिविल न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र की परिसीमा
1. कोई भी सिविल न्यायलय न कोई ऐसा वाद (मुकद्दमा) या कार्यवाई ग्रहण करेगा या जारी रखेगा और न ही कोई हुक्मनामा (डिक्री) या आदेश देगा या किसी ऐसे हुक्मनामे (डिक्री) या आदेश का पूरी तौर पर या आंशिक रूप से निष्पादन (तामील) करेगा, यदि ऐसा निष्पादन किसी भी प्रकार से, नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1995 के प्रावधानों के प्रतिकूल हो।
2. कोई भी न्यायालय किसी भी मामले के न्याय संबंध फैसले में या किसी हुक्मनामा (डिक्री) या आदेश के निष्पादन में किसी व्यक्ति पर अस्पृश्यता के आधार पर कोई अयोग्यता लागू करने वाली किसी रूढ़ि या प्रथा को मान्यता नहीं देगा।
3. दण्ड प्रक्रिया सहित 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 के अधीन दण्डनीय प्रत्येक अपराध संज्ञेय अपराध होगा और प्रत्येक अपराध, सिवाय उन अपराधों में जहां सजा कम-से-कम तीन माह की अवधि से अधिक कारावास से दण्डनीय हो, पर जूडिशियल मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी या महानगर क्षेत्र में मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट द्वारा संहिता में बतायी गयी प्रक्रिया के अनुसार संक्षेपतः (समरी ट्रायल) विचार किया जा सकेगा।
4. दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, जब किसी लोक सेवक पर यह आरोप लगाया गया हो कि उसने अपने पद के कर्तव्यों का पालन करते हुए या कार्य करते समय, नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का दुष्प्रेरण करने का अपराध किया है, तो भी न्यायालय दुष्प्रेरण के अपराध की सुनवाई:
(क) संघ के कार्यों के संबंध में नियुक्त व्यक्ति के मामले में केन्द्रीय सरकार की अनुमति के बिना नहीं करेगा।
(ख) किसी राज्य के कार्यों के संबंध में नियुक्त व्यक्ति के मामले में राज्य सरकार की पूर्व अनुमति के बिना नहीं करेगा।

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